20 रमज़ान सन 8 हिजरी मुताबिक़ 11 जनवरी 630 ईस्वी तारीखे नुबुव्वत का निहायत ही अजीमोशान और यादगार दिन है। इस्लाम मजहब का येह वोह सुनहरा पन्ना है कि जिसकी रौशनी से हर मोमिन क़ियामत के दिन तक ख़ुशी से चमकता रहेगा क्यूं कि ताजदारे दो आलम ﷺ ने इस तारीख से आठ साल पहले इनतिहाई रन्जीदगी के आलम में अपने साथियो को साथ ले कर रात की तारीकी में मक्के से हिजरत फ़रमा कर(क्योकि मक्के के काफिरो ने वहाँ के मुसलमानो का जीना हराम कर रखा था ) अपने वतने अज़ीज़ को खैरबाद कह दिया था और मक्के से निकलते वक्त खुदा के मुक़द्दस घर ख़ानए का’बा पर एक हसरत भरी निगाह डाल कर येह फ़रमाते हुए मदीने रवाना हुए थे कि “ ऐ मक्का ! खुदा की कसम ! तू मेरी निगाहे महब्बत में तमाम दुन्या के शहरों से ज़ियादा प्यारा है अगर मेरी क़ौम मुझे न निकालती तो मैं हरगिज़ तुझे न छोड़ता ।
” लेकिन आठ बरस के बाद येही वोह मसर्रत खेज़ तारीख़(दिन) है कि आप ﷺ ने एक फ़तेहे आ’ज़म की शानो शौकत के साथ इसी शहरे मक्का में आए और फ़रमाया और का’बतुल्लाह में दाखिल हो कर अपने सज्दों के जमालो जलाल से खुदा के मुक़द्दस घर की अज़मत को सरफ़राज़ फ़रमाया ।
कुफ्फारे कुरैश का अहद क्या था : – सुल्हे हुदैबिया के बयान के हिसाब से हुदैबिया के सुल्हनामे में एक येह शर्त भी दर्ज थी कि कबाइले अरब में से जो क़बीला कुरैश के साथ मुआहदा करना चाहे वोह कुरैश के साथ मुआहदा करे और जो हज़रत मुहम्मद ﷺ से मुआहदा करना चाहे वोह हज़रत मुहम्मद ﷺ के साथ मुआहदा करे ।
इसलिए इसी के कारण पर बनी बक्र कबीले ने कुरैश से आपसी मदद का मुआहदा कर लिया और बनी खुजाआ के कबीले ने रसूलुल्लाह ﷺ से आपसी मदद का मुआहदा कर लिया । ये दोनों कबीले मक्का के करीब ही में रहते थे थे लेकिन इन दोनों में काफी समय से कड़ी शत्रुता और मुखालफ़त(एक दूसरे के खिलाफ होना ) चली आ रही थी । एक मुद्दत से तो कुफ्फ़ारे कुरैश और दूसरे कबाइले अरब के कुफ्फार मुसलमानों से जंग करने में अपना सारा जोर आजमा रहे थे लेकिन सुल्हे हुदैबिया की बदौलत जब मुसलमानों की जंग कुफ़्फ़ारे कुरैश और दूसरे कुफ्फ़ार कबीले से रुकी तब बनी बक्र कबीले ने बनी खुज़ाआ कबीले से अपनी पुरानी दुश्मनी का बदला लेना चाहा और अपने सहयोगी कुफ्फारे कुरैश से मिल कर बिल्कुल अचानक तौर पर बनी खुजाआ कबीले पर हमला कर दिया और इस हमले में कुफ्फ़ारे कुरैश के तमाम रूअसा या’नी इकरिमा बिन अबी जल , सफ्वान बिन उमय्या व सुहैल बिन अम्र वगैरा बड़े बड़े सरदारों ने अलानिया बनी खुजाआ को क़त्ल किया । बेचारे बनी खुज़ाआ इस ख़ौफ़नाक ज़ालिमाना हम्ले की ताब न ला सके और अपनी जान बचाने के लिये हरमे का’बा में पनाह लेने के लिये भागे । बनी बक्र के अवाम ने तो हरम में तलवार चलाने से हाथ रोक लिया और हरमे इलाही का एहतिराम किया । लेकिन बनी बक्र का सरदार ” नौफ़ल ” इस क़दर जोशे इनतिकाम में आपे से बाहर हो चुका था कि वोह हरम में भी बनी खुजाआ को निहायत बे दर्दी के साथ क़त्ल करता रहा और चिल्ला चिल्ला कर अपनी कौम को ललकारता रहा कि फिर येह मौकअ कभी हाथ नहीं आ सकता । इसलिए उन दरिन्दा सिफ़त खूखार इन्सानों ने हरमे इलाही के एहतिराम को भी खाक में मिला दिया और हरमे का’बा की हुदूद में निहायत ही ज़ालिमाना तौर पर बनी खुजाआ का खून बहाया और कुफ्फ़ारे कुरैश ने भी इस क़त्लो गारत और कुश्तो खून में खूब, खूब हिस्सा लिया । ज़ाहिर है कि कुरैश ने अपनी इस हरकत से हुदैबिया के मुआहदे को अमली तौर पर तोड़ डाला । क्यूं कि बनी खुजाआ रसूलुल्लाह ﷺ से मुआहदा कर के आप के हलीफ़ बन चुके थे , इस लिये बनी खुजाआ पर हमला करना , येह रसूलुल्लाह ﷺ पर हम्ला करने के बराबर था । इस हम्ले में बनी खुजाआ में 23 आदमी कत्ल हो गए । इस हादिसे के बाद क़बीलए बनी खुजाआ के सरदार अम्र बिन सालिम खुजाई चालीस आदमियों का वपद ले कर फ़रयाद करने और मदद तलब करने के लिये मदीने बारगाहे रिसालत ﷺ में पहुंचे और येही फ़त्हे मक्का की तम्हीद हुई और इसी वजह से फत्ह मक्का का माअरका पेश आया ।कुरैश ने येह अहद शिकनी शा’बानुल मुअज्जम 8 सिने हिजरी में सुल्हे हुदैबिय्या के 22 माह के बाद की । यहा जो गजवा हुआ इस ग़ज़वे को ” ग़ज़वए फ़त्हे मक्का ” कहा जाता है और मुसलमानों की येह अज़ीम तरीन फ़त्ह है कि इस के साथ अल्लाह ने अपने महबूबﷺ और अपने दीन को गलबा अता फ़रमाया , इसलिए , इस के बाद अर्जे हिजाज़ में कोई काफ़िर न रहा । येह गज़वा रमज़ानुल मुबारक में हुवा और इस पर उलमाए किराम का इत्तिफ़ाक़ है ।इससे पहले अहले अरब इस बात का इन्तिज़ार कर रहे थे कि अगर हुजूर नबिय्ये रहमत , शफ़ीए उम्मतﷺ मक्कए मुकर्रमा पर फ़त्ह हासिल कर लें तो वोह भी दाइरए इस्लाम में दाखिल हो जाएं। , इसलिए , जब येह फ़त्हे अज़ीम जुहूर पज़ीर हुई तो लोग दौड़ते हुवे इस्लाम लाने लगे । इस फ़तह के बा’द मुशरिकों के लिये कोई जगह बाकी न रही ।
रब ने इस फ़तह के जरीए अपने दीन को गालिब फ़रमाया और अपने हबीबﷺ को मुज़फ्फ़र व फ़तहमन्द फ़रमा दिया ।

